एक माफिया के जनाजे में भीड़ नजर आई,
मुझे देश की हालत गंभीर नजर आई,
मैने पढ़ा था की देश में संविधान है,
पर यहां तो बंदूक ही सबसे महान है,
कत्ल करके भी कोई संत कहलाता है,
और ऐसा कहने वालो में मुझे देश का कातिल नजर आता है।
कुतर्क दिए जाते है उसे सही ठहराने को,
उसूल भुलाए जाते है उसकी तारीफें गाने को,
वो तो मजबूर था इसलिए अपराध कर बैठा,
दूसरों के रक्त से अपना उदर भर बैठा,
वो तो मसीहा था, गरीबों का, पिछड़ों का,
उसके दामन पर दाग था किसी के चिथड़ो का,
उसका सफेद कुर्ता रक्त से सुर्ख लाल था,
जिसका रक्त बहा, वो भी तो किसी का लाल था।
हां तुम सब सही हो, वो जुर्म करने को लाचार था,
हुए थे अत्याचार उसपे, उसने तो बस किया प्रतिकार था,
इक काम करो, मत मानो इस संविधान को,
मत मानो कानून कोई, हर नियम को त्याग दो,
बस इतना सा ही करना है, हर हाथ में बंदूक दो,
अत्याचार और प्रतिकार की इस जंग में मुल्क को फूंक दो,
कर लो पैदा हर नुक्कड़ पे, एक मसीहा ऐसा तुम,
बहने दो रक्त नालियों में, और बढ़ने दो जी भर के जुर्म,
पर रखना याद कवि की बात, ये आग तुम्हे भी जलाएगी,
अपराध की ये अमर बेल, एक दिन तुम पर भी छाएगी,
क्युकी हिंसा जब होती है, मासूम हर तरफ मरता है,
हिंसा के बदले हिंसा का विष हर दिल में भरता है,
हो अपराधी किसी जात का, या कोई भी उसका धर्म हो,
एक सभ्य समाज को चाहिए, की कही न ऐसा कर्म हो,
हो संविधान सर्वोपरि, जो गलत है उसका प्रतिकार हो,
अन्याय की गर्दन पर रखी, बस न्याय नियम की तलवार हो,
बंद करो महिमामंडन, अपराधी, जालिम शैतान का,
गर करते हो प्यार देश से, और सम्मान पावन संविधान का।