राम का नाम ज़ुबाँ पे, दिल में मगर अँधेरा है,
मंदिर में ढूंढे सुकून, पर भीतर मन में फेरा है।
राम का नाम ज़ुबाँ पे, दिल में मगर अँधेरा है…
लौ जलती है घी की, और भीतर जलता मन है,
आरती रोज़ उतारें, फिर भी बड़ी विचलन है।
सच बोल ना है मुश्किल, झूठ करम में ठहरा है,
राम का नाम ज़ुबाँ पे, दिल में मगर अँधेरा है…
वन-वन भटके राम, पर धर्म नहीं छोड़ा था,
कष्ट भले हो कितने, आदर्शों को नहीं तोड़ा था।
हमने तो सुविधा देखी, उनके आदर्शों को छोड़ा है,
राम का नाम ज़ुबाँ पे, दिल में मगर अँधेरा है…
सीता की पीड़ा पढ़के, आँखों में आंसू आए,
पर नारी की रक्षा में, कदम कहाँ बढ़ पाए?
लक्ष्मण-रेखा खींचे, पर खुद ने पहरा छोड़ा है?
राम का नाम ज़ुबाँ पे, दिल में मगर अँधेरा है…
राम ने क्षमा सिखाई, हमने क्रोध कमाया है,
उनकी “मर्यादा” का अर्थ, हमने कब अपनाया है?
धर्म ध्वजा के पीछे, देखो अधर्म का डेरा है,
राम का नाम ज़ुबाँ पे, दिल में मगर अँधेरा है…
इश्क़ अगर राम से है, तो राम-सा बनना होगा,
भीतर जो रावण है, उसको मरना होगा।
माला फेरें हाथों से, मन में मगर क्या फेरा है?
राम का नाम ज़ुबाँ पे, दिल में मगर अँधेरा है…
राम का नाम ज़ुबाँ पे, दिल में मगर अँधेरा है,
मंदिर की चौखट सजती, भीतर लगता फेरा है।
राम का नाम ज़ुबाँ पे, दिल में मगर अँधेरा है…